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SP-BSP gathbandhan: Akhilesh yadav और Mayawati का बेड़ा पार लगाएगा ये जातीय समीकरण

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SP-BSP gathbandhan: Akhilesh yadav और Mayawati का बेड़ा पार लगाएगा ये जातीय समीकरण

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Mayawati-Akhilesh

Mayawati-Akhilesh   |  तस्वीर साभार: ANI

लखनऊ : कभी नदी के दो तट मानी जाने वाली अखिलेश यादव (Akhilesh yadav) की सपा (SP) और मयावती (Mayawati) की बीएसपी (BSP) ने आगामी लोकसभा चुनाव (Lok Sabha Elections 2019) में बीजेपी (BJP) को मात देने के लिए शनिवार को 23 साल पुरानी शत्रुता को भुलाते हुए एक-दूसरे से हाथ मिलाकर उत्तर प्रदेश की राजनीति में एक नई इबारत लिख दी है। एसपी और बीएसपी 80 लोकसभा सीटों वाले उत्तर प्रदेश में 38-38 सीटों पर चुनाव लड़ेंगी। कांग्रेस के लिए अमेठी और रायबरेली की सीटें छोड़ी गई हैं जबकि दो सीटें छोटे दलों के लिए आरक्षित की गई हैं। माना जा रहा है कि दो सीटें निषाद पार्टी और पीस पार्टी के लिए छोड़ी गई हैं। निषाद पार्टी का निषाद बिरादरी में प्रभुत्व माना जाता है वहीं पीस पार्टी का पूर्वांचल की मुस्लिम बिरादरी में असर माना जाता है।

राजनीतिक विश्लेषक परवेज अहमद मौजूदा परिस्थितियों को एसपी-बीएसपी के गठबंधन के लिए 25 साल पहले के हालात से ज्यादा उपयुक्त मानते हैं। उनका मानना है कि पिछले 4-5 साल में पूरे देश में जिस खास तरह का ध्रुवीकरण हुआ है उसका असर राजनीति के साथ साथ समाज और कारोबार पर भी पड़ा है। उन्होंने कहा कि उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद ‘हार्ड लाइनर हिंदुत्व’ का दबदबा बढ़ा है जिससे एक खास तबके में घबराहट महसूस की जा रही है। आमतौर पर ऐसे हालात में वह तबका एकजुट हो जाता है। एसपी और बीएसपी के गठबंधन से इस तबके को एक ऐसा मंच मिल सकता है जिसके साथ वह खड़े हो सकते हैं।

गठबंधन के सामने सबसे बड़ी चुनौती का जिक्र करते हुए राजनीतिक विश्लेषक प्रोफेसर एसएन द्विवेदी कहते हैं कि एसपी और बीएसपी को गैर यादव ओबीसी और गैर जाटव दलित को अपने साथ लाने की चुनौती होगी जो 2014 के लोकसभा चुनाव और 2017 के उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में बीजेपी के साथ चला गया था। दरअसल एसपी-बीएसपी ने 25 साल पहले मंडल आयोग की सिफारिशों से राजनीति में हुए जबरदस्त बदलाव के दौर में हाथ मिलाए थे। उस वक्त मुलायम सिंह यादव अन्य पिछड़े वर्गों के बड़े नेता बनकर उभरे थे और मुस्लिम मतदाता भी उनके साथ एकजुट था। वहीं, कांशीराम दलितों के नेता के तौर पर उभरे थे।

करीबी 25 साल पहले एसपी-बीएसपी के साथ आने का ही नतीजा था कि बाबरी मस्जिद विध्वंस के बाद भी बीजेपी सत्ता में वापसी नहीं कर पाई थी। पिछले (2014 के) लोकसभा चुनाव में एसपी को करीब 22% और बीएसपी को लगभग 20% मत मिले थे। दोनों को मिला लें तो यह करीब 42% होता है। वर्ष 2017 में हुए विधानसभा चुनाव में एसपी और बीएसपी को लगभग 22-22% वोट हासिल हुए थे। अगर दोनों का वही वोट प्रतिशत बरकरार रहा तो भी वह बीजेपी के लिए कठिनाई खड़ी कर सकता है।

एक अनुमान के अनुसार, उत्तर प्रदेश में इस समय दलित मतदाता करीब 22% हैं। इनमें 14% जाटव शामिल हैं। ये बीएसपी का सबसे मजबूत वोट बैंक है। इसके अलावा बाकी 8% दलित मतदाताओं में पासी, धोबी, खटीक मुसहर, कोली, वाल्मीकि, गोंड, खरवार सहित 60 जातियां हैं। राज्य में करीब 45% ओबीसी मतदाता हैं। इनमें यादव 10%, कुर्मी 5%, मौर्य 5, लोधी 4 और जाट 2% हैं। बाकी 19% में मल्लाह, लोहार, प्रजापति, चौरसिया, गुर्जर, राजभर, बिंद, बियार, निषाद, कहार और कुम्हार सहित 100 से ज्यादा उपजातियां हैं। प्रदेश में, माना जाता है, करीब 19% मुसलमान मतदाता हैं।

वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में उत्तर प्रदेश की 80 लोकसभा सीटों में से बीजेपी गठबंधन को जबरदस्त कामयाबी के साथ कुल 73 सीटें मिली थीं। बीजेपी को 71, उसकी सहयोगी पार्टी अपना दल को 2, एसपी को 5 और कांग्रेस को 2 सीटें मिली थीं। लगभग 19% वोट पाने के बावजूद बीएसपी का खाता तक नहीं खुल सका था।

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